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UP Election Result: खोया मायावती का मैजिक! 2007 में सरकार बनाने वाली BSP सिर्फ एक सीट पर सिमटी

时间:2023-09-29 14:15:14 出处:पॉइंट्स टेबल आईपीएल阅读(143)

विधानसभा चुनाव (Assembly Election 2022) के नतीजों ने उत्तर प्रदेश की सियासत में भाजपा और सपा के लिए सत्ता और विपक्ष की भूमिका तो तय कर दी,खोयामायावतीकामैजिकमेंसरकारबनानेवालीBSPसिर्फएकसीटपरसिमटी लेकिन इन नतीजों ने बसपा के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं. चर्चा तेज हो गई है कि क्या बसपा अपना जनाधार खो चुकी है. क्या मायावती का जादू खत्म हो गया है, क्या बसपा अपना मूल वोट बैंक भी नहीं बचा पाई?38 साल पहले 1984 में बनी बसपा, 2022 के चुनाव में आते-आते अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है ऐसा लगता है.जिस बसपा ने 2007 में उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत के साथ सरकार बनाई थी, वही बसपा 10 साल में सिमटकर एक विधायक पर आ गई है. 2022 के चुनाव मेंसिर्फ एक विधायक (रसड़ा से उमाशंकर सिंह) ने ही जीत हासिल की है, बसपा के बाकी सभी प्रत्याशी चुनाव हार चुके हैं.2017 के चुनाव में बसपा के 19 विधायक थे, लेकिन 2022 आते-आते बसपा में 3 विधायक बचे थे. पार्टी सुप्रीमो मायावती के कभी खास सिपहसालार रहे राम अचल राजभर, लालजी वर्मा, नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेता उन्हें छोड़कर चले गए. बसपा जिस सोशल इंजीनियरिंग के सहारे सत्ता का सुख भोग चुकी है वह सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला 2012 के बाद ऐसा पटरी से उतरा कि आज बसपा का अपना मूल वोटर तक जा चुका है.दलितों में राजनैतिक चेतना जगाने के नाम पर, कांशीराम ने बसपा की स्थापना की थी. दलितों में चेतना और राजनीतिक एकता बढ़ाने के लिए शुरू किए गए कांशीराम के मिशन को मायावती ने राजनैतिक मुकाम दिलाया, लेकिन 2012 में सत्ता गई और 10 साल बाद 2022 में मायावती एक विधायक के आंकड़े पर सिमट गई. चुनाव दर चुनाव बसपा का गिरता ग्राफ 2022 के चुनाव में बिल्कुल खात्मे पर आ गया. अगर आंकड़ों में समझें, तो 1990 के बाद से बसपा ने अपने वोट बैंक में धीरे-धीरे इजाफा किया. 1993 से बसपा ने विधान सभा चुनावों में 65 से 70 सीटों पर जीतना शुरू किया. 2002 में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने वाली बसपा का वोट प्रतिशत 23 फीसदी पार कर गया. 2007 में बसपा को सबसे ज्यादा 40.43 फीसदी वोट मिले और उसने अपने दम पर सरकार भी बनाई.लेकिन धीरे-धीरे बसपा का पतन भी शुरू होने लगा. टिकट देने के नाम पर वसूली की चर्चा आम हो गई. खुद को दलितों की देवी के तौर पर स्थापित करने के लिए नोएडा लखनऊ में स्मारक तो बनवाए. लेकिन दलितों के उत्थान के लिए ऐसा कोई काम नहीं हुआ जिससे दलितों के वोट रोके जा सकें. इसी दौरान, राम मंदिर आंदोलन के बाद से लगातार वनवास पर रही भाजपा की सत्ता में वापसी हुई, तो उसने सबसे पहले बसपा के मूल दलित वोट बैंक पर निशाना साधा. हर विधानसभा में दलित वोटों की निर्णायक भूमिका को देखते हुए बीजेपी ने बसपा के मूल कैडर के नेताओं को पार्टी में शामिल कराया. बृजलाल, असीम अरुण जैसे तमाम अफसरों को बीजेपी में जगह दी. 2014 में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव लड़ने के बाद से ही ओबीसी और एससी वोटरों पर बीजेपी ने काम करना शुरू कर दिया था. इसका नतीजा रहा कि2017 के चुनाव में बसपा 19 सीटों पर सिमट गईऔर 2022 में तो बसपा सिर्फ एक सीट रसड़ाजीत पाई.2022 में बीजेपी ने दोबारा सत्ता हासिल की तो इसका सबसे बड़ा कारणबसपा की कमजोरी और उसके मूल वोटर का बीजेपी में शामिल होना बताया जा रहा है.

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